एक फूल की चाह प्रश्न और उत्तर Class 9

NCERT Solutions for Class 9 Hindi Sparsh ek phool ki chah Questions and Answers

पाठ : 12 एक फूल की चाह

कवि परिचय:

इस कविता के कवि है सियारामशरण गुप्ता। सियारामशरण गुप्त का जन्म झाँसी के निकट चिरगाँव में सन् 1895 में हुआ था। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त इनके बड़े भाई थे। गुप्त जी के पिता भी कविताएँ लिखते थे इस कारण परिवार में ही इन्हें कविता के संस्कार स्वत: प्राप्त हुए। गुप्त जी महात्मा गांधी और विनोबा भावे के विचारों के अनुयायी थे इसका संकेत इनकी रचनाओं में भी मिलता है। गुप्त जी की रचनाओं का प्रमख गुण है कथात्मकता। इन्होंने सामाजिक कुरीतियों पर करारी चोट की है। देश की ज्वलंत घटनाओं और समस्याओं का जीवंत चित्र इन्होंने प्रस्तुत किया है। इनके काव्य की पृष्ठभूमि अतीत हो या वर्तमान, उनमें आधुनिक मानवता की करुणा, यातना और द्वंद्व समन्वित रूप में उभरा है। सियारामशरण गुप्त की प्रमुख कृतियाँ हैं : मौर्य विजय, आर्द्रा, पाथेय, मृण्मयी, उन्मुक्त,।आत्मोत्सर्ग, दूर्वादल और नकुल।

‘एक फूल की चाह’ गुप्त जी की एक लंबी और प्रसिद्ध कविता है। प्रस्तुत पाठ उसी कविता का एक अश मात्र है। पूरी कविता छुआछूत की समस्या पर केंद्रित है। एक मरणासन्न अछूत कन्या के मन में यह चाह उठी कि काश! देवी के चरणों में अर्पित किया हुआ एक फूल लाकर काई उसे दे देता। कन्या के पिता ने बेटी की मनोकामना परी करने का बीड़ा उठाया। यह देवी के मंदिर में जा पहुँचा। देवी की आराधना भी की, पर उसके बाद वह देवी के भक्तों की नज़र में खटकने लगा। मानव-मात्र को एकसमान मानने की नसीहत देनेवाली देवी के सवर्ण भक्तों ने उस विवश, लाचार, आकांक्षी मगर अछूत पिता के साथ कैसा सलूक किया, क्या वह अपनी बेटी को फूल लाकर दे सका? यह कविता का मार्मिक अंश ही बताएगा।

प्रश्न-अभ्यास

प्रश्न 1. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

(क) कविता की उन पंक्तियों को लिखिए जिससे निम्नलिखित अर्थ का बौध होता है-

(i) सुखिया के बाहर जाने पर पिता का हृदय काँप उठता था।

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उत्तर: मेरा हृदय काँप उठता था,
         बाहर गई निहार उसे ;
         यही मनाता था कि बचा लूँ
         किसी भाँति इस बार उसे।

(ii) पर्वत की चोटी पर स्थित मंदिर की अनुपम शोभा।

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उत्तर:  ऊँचे शैल – शिखर के ऊपर
           मंदिर था विस्तीर्ण विशाल ;
           स्वर्ण – कलश सरसिज विहसित थे
           पाकर समुदित रवि – कर – जाल।

(iii) पुजारी से प्रसाद/फूल पाने पर सुखिया के पिता की मन:स्थिति।

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उत्तर: भूल गया उसका लेना झट,
          परम लाभ – सा पाकर मैं।
          सोचा, – बेटी को माँ के ये
          पुण्य – पुष्प दूँ जाकर मैं।

(iv) पिता की वेदना और उसका पश्चाताप।

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उत्तर:अंतिम बार गोद में बेटी,
         तुझको ले न सका मैं हा !
         एक फूल माँ का प्रसाद भी
         तुझको दे न सका मैं हा!

(ख) बीमार बच्ची ने क्या इच्छा प्रकट की?

उत्तर: बीमार बच्ची को देवी मां के प्रसाद का फूल चाहिए था इसलिए उसने यह इच्छा प्रकट की।

(ग) सुखिया के पिता पर कौन-सा आरोप लगाकर उसे दंडित किया गया?

उत्तर: सुखिया के पिता पर मंदिर को शुद्ध करने का आरोप लगाया गया क्योंकि वह छोटी जाति के थे और मंत्र में छोटी जाति वालों को जाना मना था।

(घ) जेल से छूटने के बाद सुखिया के पिता ने अपनी बच्ची को किस रूप म पाया?

उत्तर: जब सुखिया के पिता जेल से छूट गए तो उन्होंने अपनी बच्ची को राख के ढेर के रूप में पाया।

(ङ) इस कविता का केंद्रीय भाव अपने शब्दों में लिखए।

उत्तर: इस कविता का केंद्रीय भाव छुआ छूत पर आधारित है। यह मानवता के नाम पर बहुत बड़ा कलंक है क्योंकि जन्म के आधार पर किसी को नीची जाति  वाला मानना अपराध है। मंदिर जैसे पवित्र स्थानों पर  छुआछूत  जैसी कुप्रथा है होती रहती हैं यह बहुत बड़ा अपराध है कि किसी ने की वाली जाति को मंदिर में प्रवेश ना करने देना क्योंकि वह नीची जाति से आया है। सभी को सामाजिक और धार्मिक स्वतंत्रता प्राप्त होनी चाहिए।

(च) इस कविता में से कुछ भाषिक प्रतीकों/बिबो को छाँटकर लिखिए-
उदाहरण -अंधकार की छाया

(i) ……………………………………………………………………………………………….

(ii) ……………………………………………………………………………………………….

(iii) ……………………………………………………………………………………………….

(iv) ……………………………………………………………………………………………….

(v) ……………………………………………………………………………………………….

उत्तर:  इस कविता में से कुछ भाषिक  प्रतीक कुछ इस प्रकार है :-

(1) स्वर्ण – घनों में कब रवि डूबा
(2) जलते से अंगारे
(3) विस्तीणृ विशाल
(4) पतित तारिणी पाप हरिणी
(5) निज कृष रव में

प्रश्न 2. निम्नलिखित पंक्तियों का आशय स्पष्ट करते हुए उनका अर्थ सौंदर्य बताइए–

(क) अविश्रांत बरसा करके भी

      आंखें तनिक नहीं रीतीं

उत्तर – आशय : इस पंक्ति का यह आशय है कि सुखिया के पिता के आंख से सात दिन तक आंसू निकलने के बाद भी, उसके आंसु रुकने का नाम नहीं ले रही थी।

अर्थ सौंदर्य : सुखिया की इच्छा पूरी करने के लिए उसके दलित पिता बिना कुछ सोचे समझे मंदिर में प्रवेश कर गए। उनके इस प्रवेश को लोगों ने दोष प्रवेश कहकर उन्हें सात दिन के कारावास की सजा दे दि। सुखिया अपने मरण अवस्था में पड़ी रही और उसके पिता सुखिया कि आखिरी इच्छा पूरा करने में असफल रहे। इसलिए सुखिया के पिता के आंखों से आंसुओं की धारा कारावास में सात दिनों तक लगातार बहती रही, पर फिर भी आंसू उसके आंख से खाली नहीं हो रहे और अब भी आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं।

(ख) बुझी पड़ी थी चिता वहाॅं पर 

      छाती धधक उठी मेरी

उत्तर – आशय : इस पंक्ति का यह आशय है कि सुखिया की चिता तो जल गई और उसकी राख भी ठंडी हो गई थी। लेकिन उसकी चिता की ठंडी रात देखकर उसके पिता की छाती धधक उठी और वह बहुत हताश हो गया।

अर्थ सौंदर्य : पिता सात दिन कि कारावास की सजा से छूटने के बाद अपनी बेटी सुखिया के बारे में जानने के लिए व्याकुल था। वह सीधा अपने घर की ओर भागा पर सुखिया उसे घर पर नहीं मिली। घर पहुॅंच कर उसे ज्ञात हुआ कि सुखिया को श्मशान ले गए होंगे। वह रोता बिलखता जब शमशान पहुॅंचा, जहाॅं उसकी बेटी का दाह संस्कार किया जा चुका था। उसकी चिता बुझ चुकी थी, यानी दाह संस्कार किए हुए बहुत देर हो चुका था और उसकी चिता की राख ठंडी पड़ चुकी थी। अपनी बेटी की बुझी हुई चिता देखकर उसका ह्रदय धधक उठा। मन पीड़ा से भर गया और आंखों से आंसू बहने लगे। 

(ग) हाय! वही चुपचाप पड़ी थी

     अटल शांति-सी धारण कर 

उत्तर – आशय : इस पंक्ति का यह आशय है कि सुखिया जो एक चंचल लड़की थी। जब वह ज्वर से पीड़ित हुई, तो चुपचाप लेटी हुई है।

अर्थ सौंदर्य : यहाॅं पर कवि ने पिता की वेदना बताई है, कि उसके पिता सोचते हैं जो मासूम और चंचल सी लड़की एक क्षण के लिए कहीं चुपचाप बैठती नहीं थी। हरदम खेलना कूदना लगा रहता था, आज वही लड़की महामारी की शिकार होकर ऐसी ग्रस्त हुई कि वह एकदम शांत और निश्चल होकर बिस्तर पर चुपचाप पड़ी है। सुखिया की यह शांति इतनी मारक थी की उसके पिता के ह्रदय को तार-तार लगने लगी। उसने अपनी खेलती कूदती और चंचल बेटी को इतना शाॅंत और पीड़ा सहित कभी नहीं देखा था।

(घ) पापी ने मंदिर में घुसकर 

      किया अनर्थ बड़ा भारी

उत्तर – आशय : इस पंक्ति का यह आशय है कि यहाॅं पर लोगों का कथन है कि सुखिया के पिता के मंदिर में घुसने से उनकी दृष्टि में देवी और मंदिर की पवित्रता भंग हो गई। लोगों ने उसके इस मंदिर में घुसने के प्रयास को भारी अनर्थ करार दिया और उसे बहुत अपमानित किया गया।

अर्थ सौंदर्य : कवि ने इस पंक्ति के साथ यहाॅं पर एक सामाजिक विभेद का मुद्दा उठाया है। जो कि छुआछूत है। मंदिर में अछूतों का प्रवेश निषेध था, पर अपनी मरणासन्न कन्या सुखिया की आखिरी इच्छा पूरी करने हेतु उसके दलित पिता जब बिना कुछ सोचे समझे मंदिर में देवी के प्रसाद के रूप में एक फूल लेने गया तो मंदिर के भक्तों और ठेकेदार पुजारियों ने इसे अपना और मंदिर का अपमान समझा। उनके अनुसार एक अछूत ने मंदिर में घुसकर देवी और मंदिर की पवित्रता भंग कर दी है। लोगों की दृष्टि में यह भारी पाप था। अंततः उसे मंदिर से धक्के मार बाहर निकाल अपमानित किया और दंड स्वरूप उसे सात दिन का कारावास भोगने भेज दिया गया।

योग्यता-विस्तार

प्रश्न 1. ‘एक फूल की चाह’ एक कथात्मक कविता है। इसकी कहानी को संक्षेप में लिखिए।

उत्तर – एक बड़े स्तर पर फेलने वाली बीमारी बहुत भयानक रुप से चारों ओर फैली हुई थी। उस महामारी ने लोगों के मन में भयानक डर बैठा दिया था। इस कविता में एक पिता अपनी बेटी को बार-बार बाहर जाने से रोकता था। लेकिन सुखिया उसकी एक ना सुनती थी और खेलने के लिए बाहर चली जाती थी। जब भी वह अपनी बेटी को बाहर जाते हुए देखता था तो उसका ह्रदय डर के मारे काॅंप उठ जाता था। वह यह सोचता था कि किसी तरह उसकी बेटी इस महामारी का शिकार ना हो।

एक दिन सुखिया के पिता ने पाया कि सुखिया का शरीर बुखार से तप रहा है। उस बच्ची ने अपने पिता से कहा कि वह बस देवी माॅं के प्रसाद का एक फूल चाहती है ताकि वह ठीक हो जाए। सुखिया का पिता सुखिया की चिंता में इतना डूबा रहता कि उसे किसी भी बात का होश ही नहीं रहता था। जो बच्ची कभी भी एक जगह शांति से नहीं बैठती थी वही आज शांति धारण कर चुपचाप लेटी हुई है। 

कवि मंदिर का वर्णन करते हुए कहते हैं कि वह पहाड़ की चोटी के ऊपर एक विशाल सा मंदिर है। उसके विशाल आंगन में सूर्य के पढ़ते हुए किरण की वजह से कमल भी सोने जैसे चमकते हैं।

जब सुखिया का पिता मंदिर के अंदर घुस देवी का प्रसाद लेने वाला था कि भक्तों ने उसे देखते ही बाला ‘देखो यह अछूत मंदिर के अंदर घुसा जा रहा है’। भक्तों के लिए यह बड़ा भारी अनर्थ था। उनकी दृष्टि में उसने देवी माॅं और उनके मंदिर को अशुद्ध कर दिया था। 

भक्तों ने उसे घेर लिया और उसपर घूॅंसों और लातों की बरसात करके उसे नीचे गिरा दिया और अपमानित करते हुए मंदिर के बाहर धक्के मार भगा दिया। लोग उसे न्यायलय ले गए। वहाॅं उसे दंड स्वरूप सात दिन का कारावास दे दिया।

सुखिया के पिता को यह सात दिन मानो की सदियों जैसे लगने लग गए। उस सातों दिन उसकी आंखों से आंसू बिना रुके बरसने के बाद भी बिल्कुल नहीं सूखे थे। जब सुखिया के पिता जेल से छूटा वह अपनी बेटी सुखिया के बारे में जाने के लिए व्याकुल था। वह सीधा अपने घर भागते हुए पहुॅंचा। जब उसे घर पहुॅंचने पर सुखिया नहीं मिली तब उसे सुखिया की मौत का पता चला।

वह अपनी बच्ची को देखने के लिए सीधा दौड़ता बिलखता शमशान पहुॅंचा। जहाॅं उसके रिश्तेदारों ने पहले ही उसकी बच्ची का अंतिम संस्कार कर दिया था और अब उसकी चिता की राख भी ठंडी हो चुकी थी। अपनी बेटी की बुझी हुई चिता देखकर उसका कलेजा जल उठा। उसकी सुंदर फूल सी कोमल बच्ची अब राख के ढेर में बदल चुकी थी।

प्रश्न 2. ‘बेटी’ पर आधारित निराला की रचना ‘सरोज-स्मृति’ पढ़िए।

उत्तर – छात्र स्वयं अपने स्कूल के पुस्तकालय से सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ रचित कविता ‘सरोज स्मृति’ पुस्तक लेकर स्वयं पढ़ें।

प्रश्न 3. तत्कालीन समाज में व्याप्त स्पृश्य और अस्पृश्य भावना में आज आए परिवर्तनों पर एक चर्चा आयोजित कीजिए।

उत्तर – पहला छात्र: एक समय था जब हमारे समाज में ऊॅंच-नीच और छुआछूत का बोलबाला था।

दूसरा छात्र: हाॅं हाॅं और यह तो गाॅंव में काफी ज्यादा ही था।

तीसरा छात्र: यह बुराई आज कल कम हो चुकी है, परंतु पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है।

चौथा छात्र: पर इसे पूरी तरह हटाने के लिए सरकार ने कदम भी उठाए हैं जैसे उन्होंने इसे अपराध घोषित कर दिया है।

पाॅंचवा छात्र: अपराध घोषित करने से कुछ नहीं होता समस्या ज्यों-कि-त्यों ही है। कुछ पैसे वाले लोग समाज में अपने आप को काफी ऊॅंचा मानते हैं और गरीबों को नीच मानकर उनसे दूर रहते हैं।

छठा छात्र: पर हर मनुष्य की अपनी अलग-अलग सोच है। एक झटके में तो इतनी बड़ी समस्या खत्म नहीं हो जाएगी इसलिए इस समस्या को हटाने के लिए सभी लोगों को साथ मिलकर आवाज उठानी होगी। 

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