पाठ: 14 – नागार्जुन :– बदल को घिरते देखा है प्रश्न और उत्तर Class 11

NCERT Solutions for Class 11 Hindi Kshitij chapter – 14 Nagarjun :- Badal Ko Ghirte Dekha Hai Questions and Answers

प्रश्न-अभ्यास

1. इस कविता में बादलों के सौंदर्य चित्रण के अतिरिक्त और किन दृश्यों का चित्रण किया गया है?

Answer:

कवि ने मौसम के रोमांच से भरपूर तरीके से चित्रित किया है। पावस की रुत में, उन्होंने एक उमसी हंस के द्वारा मैदानी क्षेत्रों से लाए गए कमल के भीतर के नरम धागे को ढूंढने का आकर्षक वर्णन किया है, जब वह श्यामल नाल के जल में तैर रहा था।

दूसरी ओर, वसंत ऋतु की सुंदर प्राभात में, वे सरोवर के किनारे चकवा-चकई बिरड़ों की प्यार भरी मनमोहक खेलने की चित्रण किया है। उन्होंने बर्फीली घाटियों में अपनी नाभि की खुशबू से मोहित होकर कस्तूरी मृग की तरह दौड़ते हुए उनका सुंदर वर्णन किया है, जो अपने ऊपर चढ़ने की ओर बढ़ रहा था।

कवि ने कालिदास की ‘मेघदूत’ को, कुबेर, और अलकापुरी को भी याद किया है। वे वनों में देवदार के घने वन में फूलों से बालों की सजावट करके बैठे थे, अपने गले में नीलम की माला पहने थे, और अंगूरों से बनी सुरा पीकर बंसी बजा रहे थे, जो किन्नर-किन्नरियों के आंगूरों से बनी थी। इस तरीके से, वे एक आकर्षक चित्रण प्रस्तुत करते हैं।

2. प्रणय-कलह से कवि का क्या तात्पर्य है?

Answer:

प्रणय-कलह से कवि का उद्देश्य प्रेमी युगल के बीच हलकी-फुलकी तकरार या छेड़छाड़ के माध्यम से भी आनंद लेने का है, जिससे प्रेम से भरपूर आनंद उन्हें मिलता है। यह तो नजर में एक विवादित स्थिति के रूप में दिख सकता है, परंतु इसके पीछे एक अत्यधिक स्नेह और प्रेम का भाव छिपा होता है।

3. कस्तूरी मृग के अपने पर ही चिढ़ने के क्या कारण हैं?

Answer:

कस्तूरी मृग के अंदर से एक अनूपचार्य और अद्वितीय मधुर सुगंध उधवती है, जोकी उसके नाभि के अंदर से ही आ रही होती है और इस पर उस मृग का यकीन होता है कि यह सुगंध कहीं दूसरे स्त्रोत से आ रही होगी। 

वह उस सुगंध की खोज में उत्साहपूर्वक दौड़ने लगता है, परंतु हमेशा उसका अहसास होता है कि वह यह सुगंध हमेशा ही उसके पास है। उसके स्रोत को कभी भी वह दिखाई नहीं देता, जिससे वह दौड़ते-दौड़ते थक जाता है, और अपना उद्देश्य हासिल नहीं कर पाता। इस कारण, वह अपने आप पर ही चिढ़ जाता है।

4. बादलों का वर्णन करते हुए कवि को कालिदास की याद क्यों आती है? 

Answer:

हिमालय के पर्वत श्रेणियों में भ्रमण करते हुए, कवि एक स्थल पर पहुंचते हैं जो कालिदास के महाकाव्य “मेघदूत” में उन्होंने “अलकापुरी” के रूप में वर्णित किया था। वह यह भी वर्णन करते हैं कि उस स्थल पर निवास करने वाली एक विरहिणी यक्षिणी ने आकाश में छाए हुए बादल को अपने प्रियतम के पास संदेश भेजने के रूप में दूत के रूप में बनाया था। जब कवि वहां आकाश में छाए बादलों को देखते हैं, तो वह उन्हें मेघदूत (बादल के दूत) की याद आती है, जिससे परिणामस्वरूप, उन्हें मेघदूत के समय के कालिदास की भी स्मृति हो जाती है। 

5. कवि ने ‘महामेघ को झंझानिल से गरज–गरज भिड़ते देखा है’ क्यों कहा है?

Answer:

कवि ने ‘महामेघ’ को झंझानिल से गरजते हुए भिड़ते हुए देखा है, और यह कहा है क्योंकि उसने मेघों को कई बार भीषण रूप में देखा है, अर्थात उसने भीषण वर्षा अपनी आँखों से देखी है। इससे कवि के प्राकृतिक प्रेम और ज्ञान का पता चलता है कि आकाश में छाए हुए सुंदर और आकर्षक बादलों का अत्याधिक विकराल और भयानक रूप भी हो सकता है। जो बादल अपने शांत रूप में मन को आनंदित करते हैं, वे ही भयंकर रूप से टकराते और गरजते हुए मनुष्य के मन में डर भी उत्पन्न कर सकते हैं। इससे हमें यह सिखने को मिलता है कि निस्संदेह आकर्षक चीजों के पीछे उनके भयानक पहलु हो सकते हैं।

6. ‘बादल को घिरते देखा है’ पंक्ति को बार-बार दोहराए जाने से कविता में क्या सौंदर्य आया है? अपने शब्दों में लिखिए।

Answer:

‘बादल को घिरते देखा है’ पंक्ति को बार-बार दोहराए जाने से कविता में सौंदर्य आया है की जैसे , पावस ऋतु के वर्षाओं के बादलों का वर्णन किया गया है। कहीं-कहीं बसंत या शीत ऋतु में बादलों की अलग-अलग रूपों का चित्रण किया गया है। इसके साथ ही कवि ने यह भी प्रमाणित किया है कि वे इन सभी दृश्यों को स्वयं देखे हैं, और उनके साफ़ दर्शनों ने “बादल को घिरते देखा है” कविता को विशेष रूप से सुंदर बना दिया है। इससे स्पष्ट होता है कि कवि ने बादलों की विविध रूपों के भावपूर्ण सौंदर्य का स्वयं का अनुभव किया है, और वह इस अनुभव को अपने पाठकों के साथ साझा करना चाहते हैं।

7. निम्नलिखित का भाव स्पष्ट कीजिए-

(क) निशा काल से चिर-अभिशापित / बेबस उस चकवा चकई का बंद हुआ क्रंदन, फिर उनमें / उस महान सरवर के तीरे शैवालों की हरी दरी पर / प्रणय-कलह छिड़ते देखा है।

Answer:

आशय- चकवा और चकई, जो दीर्घकाल से एक शाप के बाद अलग हो गए थे, अब बेबसी और पीड़ा में रात भर चीखते रहते थे। लेकिन अब उनका वेदनापूर्ण स्वर चुप हो गया था। इस समय, एक विशाल सरोवर के किनारे, हरा रंग की शैवालों की छायादार दरी पर, चकवा और चकई एक प्यार भरा खेल खेल रहे थे। कवि कहते हैं कि मैंने पहाड़ी क्षेत्र के आकर्षक प्राकृतिक सौंदर्य के बीच इस प्रेमपूर्ण और भावपूर्ण दृश्य को देखा है।

(ख) अलख नाभि से उठनेवाले / निज के ही उन्मादक परिमल- के पीछे धावित हो-होकर / तरल तरुण कस्तूरी मृग को अपने पर चिढ़ते देखा है।

Answer:

आशय- अपनी नाभि के अदृश्य अंश से उठने वाली अपनी अनूप खुशबू के पीछे दौड़ते-दौड़ते थक जाने वाले युवा कस्तूरी मृग को कवि ने अपने ऊपर चढ़ते हुए देखा है। इसका भाव यह है कि उन्होंने अपनी नाभि से आने वाली महक को बाहर से पहचानकर वहाँ तक पहुँचने के लिए युवा कस्तूरी मृग को दौड़ते हुए देखा है। हालांकि, उन्हें वह स्थान कहीं नहीं मिलता और वे अपने ऊपर ही चढ़ते हैं, परंतु उनकी प्रयासओं की महत्वपूर्णता है।

8. संदर्भ सहित व्याख्या कीजिए-

(क) छोटे-छोटे मोती जैसे ……………. कमलों पर गिरते देखा है।

Answer:

प्रसंग: प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक ‘अंतरा’ (भाग-1) में संकलित कविता ‘बादल को घिरते देखा है’ से लिया गया है। इसके रचियता कवि नागार्जुन हैं। इसमें पर्वत के शिखरों पर उमड़ने-घुमड़ने वाले मेघों की कई छवियों की प्राकृतिक सुषमा को दर्शाया है।

व्याख्या: कवि के अनुसार निर्मल और सफेद पर्वत की चोटियों पर मैनें बादल को घिरते हुए देखा है मैंने उस बादल की ठंडी एवं छोटे-छोटे मोतियों के समान ओस की बूंदो को मानसरोवर में खिले हुए सुनहले कमल के फूलों पर गिरते दुए देखा है। मैंने बादल को घिरते हुए देखा है।

विशेष: 

छोटे-छोटे’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।

(ख) समतल देशों से आ-आकर ……………. हंसों को तिरते देखा है।

Answer:

प्रसंग: पूर्ववत। इसमें पर्वत शिखरों पर उमड़ते-घुमड़ते वाले मेघों की विविध छवियों की प्राकृतिक सुषमा को व्यक्त किया है।

व्याख्या: कवि कहता है कि ऊँचे हिमालय पर्वत के कंधों रूपी चोटियों पर अनेक छोटी-बड़ी झीलें है। उन झीलों के काले-नीले जल में मैंने उन हंसों को तैरते हुए देखा है, जो वर्षा काल में हवा न चलने के कारण होने वाली भीषण गर्मी से व्याकुल होकर मैदानी क्षेत्रों से यहाँ आकर कमल नाल के भीतर स्थित कड़वे और मीठे कोमल तंतु ढूँढ़ते रहते हैं मैंने हिमालय पर बादल को घिरते हुए देखा है।

विशेष: 

‘सलिल में समतल’, ‘ऊमस से आकुल’ में अनुप्रास अलंकार है। 

‘आ-आकार’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।

(ग) ऋतु वसंत का सुप्रभात था ……………. अगल-बगल स्वर्णिम शिखर थे।

Answer:

प्रसंग: पूर्ववत्। यहाँ क्रौंच-युगल की प्यार भरी छेड़छाड़ का अत्यंत मनोरम दृश्य दिया हैं।

व्याख्या: कवि कहता है कि वसंत ऋतु की सुंदर सुबह थी। हवा धीरे-धीरे बह रही थी। नवोदित सूर्य की कोमल किरणें पड़ रही थीं। हिमालय पर्वत की दो पास-पास स्थित ऊँची-ऊँची चोटियाँ सोने की काँति जैसा सुनहला रंग लिए चमक रही थीं। भाव यह है कि अलग-बगल खड़ी बर्फ से घिरी हुई दोनों सफेद चोटियाँ पर सूर्य की सुनहली किरणों के पड़ने से वे सोने की तरह चमक रही थी।

कवि कहता है कि मैनें पर्वतीय प्रदेश के आकर्षक प्राकृतिक सौंदर्य के बीच प्रणय का ऐसा सुंदर व भावपूर्ण दृश्य भी देखा है। मैंने पर्वत की ऊँची चोटियों पर बादल को घिरते हुए देखा है।

विशेष: 

‘स्वर्णिम शिखर’, ‘चकवा-चकई’ में अनुप्रास अलंकार है। 

‘शैवालों की हरी दरी’ में रुपक अलंकार है।

(घ) ढूँढ़ा बहुत परंतु लगा क्या ……………. जाने दो, वह कवि-कल्पित था।

Answer:

प्रसंग: पूर्ववत। इसमें पर्वत शिखरों पर छाई मेघमाला द्वारा कालिदास द्वारा रचित विरह काव्य ‘मेघदूत’ का स्मरण करवाया है।

व्याख्या: कवि निराशावादी स्वर में कहते हैं कि न जाने वह धनपति कुबेर, जिसने यत्र को निर्वासन का दंड दिया था, कहाँ चला गया? उसकी वैभव नगरी अलकापुरी भी कहाँ चली गई है’ कालिदास ने अपने प्रसिद्ध विरह-काव्य ‘मेघदूत’ में जिस आकाश गंगा का वर्णन किया है, वह भी न जाने कहाँ बहती है? उस आकाश-गंगा का जल कही पता नहीं चला। जिस मेघ को यक्ष का दूत बनाकर अलकापुरी भेजा था वह मेघदूत की संभवतः इसी पर्वत पर बरस पड़ा हो। 

विशेष: 

‘कवि कल्पित’ में अनुप्रास अलंकार की छटा है।

योग्यता-विस्तार

1. अन्य कवियों की ऋतु संबंधी कविताओं का संग्रह कीजिए।

2. कालिदास के ‘मेघदूत’ का संक्षिप्त परिचय प्राप्त कीजिए।

3. बादल से संबंधित अन्य कवियों की कविताएँ यादकर अपनी कक्षा में सुनाइए।

4. एन.सी.ई.आर.टी. ने कई साहित्यकारों, कवियों पर फ़िल्में तैयार की हैं। नागार्जुन पर भी फ़िल्म बनी है। उसे देखिए और चर्चा कीजिए।

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