पाठ: 11 – देव :- हंसी की चोट ;  सपना ; दरबार प्रश्न और उत्तर Class 11

NCERT Solutions for Class 11 Hindi Kshitij chapter – 11 Dev :- Hansi ki chot ; Sapna ; Darbar Questions and Answers 

प्रश्न-अभ्यास

1. ‘हँसी की चोट’ सवैये में कवि ने किन पंच तत्त्वों का वर्णन किया है तथा वियोग में वे किस प्रकार विदा होते हैं?

Answer:

‘हँसी की चोट’ सवैये में कवि ने वायु, जल, अग्नि, पृथ्वी, और आकाश को अद्वितीय दृष्टिकोण से चित्रित किया है, जैसे कि प्राकृतिक महाकवि के पांच रूपों की विविधता को दर्शाते हुए। वियोग के समय, सांसों के साथ वायु भाग गई, और निरंतर आँखों से आंसूओं का प्रवाह होता रहता है, जिसके कारण शरीर से सम्पूर्ण जल बह गया। व्यक्ति ने अपने सारे गुणों और शक्तियों को साथ लिया और उन्हें तेजी से गति में बदल दिया। इसके साथ ही, पृथ्वी तत्व ने भी शरीर को कुचलकर बड़े ही दूर तक ले जाने का काम किया, जबकि केवल आकाश, अर्थात् शून्य तत्व, प्रेम की आशा से प्रेरित होकर बच गया है, जैसे कि विशेष रूप से वो शुन्यता की आशा के रूप में है। 

2. नायिका सपने में क्यों प्रसन्न थी और वह सपना कैसे टूट गया?

Answer:

नायिका ने अपने सपने में देखा कि झर-झर की आवाज़ के साथ हल्की-हल्की बूँदें गिर रही हैं। आकाश में बादल गड़गड़ाहट के साथ छाए हुए हैं। इसी समय, कृष्ण नायिका के पास आए और कहा, “आओ, आज हम झूला झूलते हैं।” नायिका बहुत खुश हुई। वह उठने के लिए तैयार थी कि अचानक नींद खुल गई और उसका सपना टूट गया। इस तरह उसके जागते ही उसका भाग्य सो गया।

3. ‘सपना’ कवित्त का भाव-सौंदर्य लिखिए। 

Answer:

भाव-सौंदर्य- इस कविता में कवि ने शृंगार रस के उल्लास और वियोग के दुख को एक साथ जोड़कर एक अद्वितीय भावना का चित्रण किया है। नायिका स्वप्न में देख रही है कि झर-झर की आवाज़ के साथ हल्की-हल्की बूँदें गिर रही हैं, और आकाश में गड़गड़ाहट करते हुए बादल हैं। कृष्ण आकर उससे कहते हैं कि वे आज झूला झूलें। नायिका खुशी-खुशी तैयार हो जाती हैं, लेकिन तब तक उसकी नींद खुल जाती है। इस प्रकार, संयोग के साथ-साथ ही वियोग की भी भावना उत्पन्न हो जाती है।

कवि ने इस कविता में प्राकृति की सुंदरता का विवरण भी किया है, वर्षा की ऋतु के आकर्षक दृश्य को उद्दीपक के रूप में चित्रित करते हुए। नायिका को कृष्ण के साथ होने का आनंद हो रहा है, जिससे उसका भाग्य बदल रहा है, और फिर नींद उठ जाती है। कवि ने यहाँ एक अद्वितीय उक्ति के रूप में नायिका के अनुभव का चित्रण किया है। उसको उठने का मन होता है, परंतु उसके पैर नहीं उठते हैं, और बिना पैरों की नींद उठ जाती है। इसी तरह, कवि ने भाव-सौंदर्य का अद्भुत चित्रण किया है। जब नायिका सोती है, तो उसका भाग्य जागा हुआ है, और जब वह जागती है, तो उसका भाग्य सो जाता है। कवि ने इस कविता में दिखाया है कि जो चीजें संयोग के समय आनंद प्रदान करती हैं, वो वियोग के समय और भी दर्दनाक हो सकती हैं।

4. ‘दरबार’ सवैये में किस प्रकार के वातावरण का वर्णन किया गया है?

Answer:

‘दरबार’ कविता में कवि देव ने तत्कालीन समाज और दरबारी वातावरण की भोग-विलास की अधिक प्रवृत्ति का विवरण दिया है। उन्होंने यह कहा है कि राजा, दरबारी, और सभासद, सभी लोग भोग और विलास में डूबे हुए हैं। कोई भी किसी की बात को सुनने और समझने की क़ोशिश नहीं करता है। उनकी बुद्धि कुछ ऐसे ही हालात में है कि वे ब्रह्मन की तरह जानकारी का अध्ययन नहीं करते, बल्कि वे रात दिन खुद को खुद से बसे हुए हैं, जैसे कि भोग और विलास के प्रयास में पागल हो गए हैं।

5. दरबार में गुणग्राहकता और कला की परख को किस प्रकार अनदेखा किया जाता है?

Answer:

‘दरबार’ कविता में सभी व्यक्ति रंग-रूप के आदी होकर वहीं खोए हुए हैं। दरबार में सभी अपने आकर्षणों में पूरी तरह लिपटे हुए हैं। सम्पूर्ण शासक वर्ग भोग-विलास के जाल में फंसे हैं। राजा अपने राज्य की समस्याओं को नजरअंदाज कर रहे हैं और दरबार के लोग उनके बारे में कोई शिकायत नहीं कर रहे हैं। सभासदगण लोगों की बातों को नहीं सुन रहे हैं। सभी लोग रंग-रूप के भोग में लिपटे हुए हैं। वे अपने कर्तव्यों को भूलकर खुद की देह के आसपास अपनी सुंदरता में खो जाते हैं, जैसे कि भोग-विलास के पीछे पागल हो गए हैं। इस तरह, दरबार में गुणग्रहण और कला की मूल्यांकन को नजरअंदाज किया जाता है।

6. आशय स्पष्ट कीजिए-

(क) हेरि हियो जु लियो हरि जू हरि। 

Answer:

आशय- नायिका से उसके प्रिय ने मुँह फेर लिया है जिससे वह विरह की अग्नि में जल रही है और हँसना तक भूल गई है। वह दिन-रात उसी को ढूँढती फिर रही है, जिसने उसके हृदय का हरण कर लिया है।

(ख) सोए गए भाग मेरे जानि वा जगन में।

Answer:

आशय- गोपी अपने स्वप्न में देखती हैं कि झर-झर की आवाज के साथ हल्की-हल्की बूँदें गिर रही हैं, और आकाश में बादल छाए हुए हैं। इसी समय, कृष्ण ने मेरे पास आकर झूलने का प्रस्ताव दिया। जिससे मैं अत्यधिक प्रसन्न हो गई। लेकिन उसी समय मेरी नींद खुल गई और मैं जाग गई। मेरे जागने से मेरा स्वप्न टूट गया, और तब वहाँ न बादल थे और न ही कृष्ण थे। इस प्रकार, मेरे जागने से मेरा स्वप्न खो गया, और तब मेरा भाग्य सो गया।

(ग) वेई छाई बूँदै मेरे आँसु है दृगन में।

Answer:

आशय- नायिका को एक सपना दिखाई दिया, जिसमें उसका प्रियतम उसके पास मौजूद था। चारों ओर हल्की-हल्की बरसात हो रही थी, और आकाश में बादल छाए हुए थे, जिससे उसे मिलने की प्रसन्नता हो रही थी। लेकिन तभी उसकी नींद टूट गई। वह सपना, जिसे वह देख रही थी, वह टूट गया। मिलन के आनंद की वही बूँदें अब वियोग के दर्द के रूप में उभर आई थीं। इस प्रकार, संयोग में आनंदित होने वाली स्थितियाँ वियोग के समय वेदना को और भी गहरी बना रही थीं।

(घ) साहिब अंध, मुसाहिब मूक, सभा बहिरी।

Answer:

आशय- कवि ‘दरबार’ कविता में एक अत्यंत अद्वितीय दरबार का वर्णन करते हैं, जहाँ स्वामी, अर्थात् राजा, अंधा हो चुका है, उसके दरबारी मूक हो चुके हैं, और राजसभा बहरी हो चुकी है। इस विशेष दरबार में स्वामी कि स्थिति को बड़े रोचक तरीके से चित्रित किया गया है, जैसे कि वह अपने भोग-विलास में सम्पूर्ण रूप से डूब चुके हैं। इस अद्वितीय दरबार में दरबारी भी अपने स्थिति के बदल जाने के कारण मूक हो चुके हैं, और राजसभा भी अपने कर्तव्यों को भूल चुकी है, जिससे हमें एक नये परिदृश्य का सुंदर चित्रण मिलता है।

7. देव ने दरबारी चाटुकारिता और दंभपूर्ण वातावरण पर किस प्रकार व्यंग्य किया है? 

Answer:

इस कविता में, देव ने तत्कालीन राजाओं और दरबारियों के बारे में बेहद विशेष तरीके से व्यक्ति किया है। वे बताते हैं कि राजा अब अंधे की तरह हो गए हैं, उनके दरबारी गूँगे हो चुके हैं और सभासद बहरे की तरह बन गए हैं। इससे स्पष्ट होता है कि राजा यथार्थ घटनाओं को नहीं समझते हैं, और उन्होंने अविवेकपूर्ण निर्णय लिए हैं, बिना सच्चाई के प्रति विवेक का द्योतक किये। दरबारी लोग उनके गलत कार्यों के प्रति उद्घाटन नहीं करते, बल्कि उनकी खराबियों को छिपाते हैं और सभी बड़े-बड़े अधिकारियों के साथ चाटुकारिता में लगे रहते हैं। वे सभी रूप सौंदर्य के पीछे बिना किसी विचार के भोग-विलास में डूबे हुए हैं और किसी की बात नहीं सुनते। कवि ने इस व्यंग्यपूर्ण चित्रण के माध्यम से उनकी स्थिति का विवरण किया है और उन्हें ‘नट की बिगड़ी मति’ कहकर उनकी मूर्खता का मजाक उड़ाया है।

8. निम्नलिखित पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या करिए–

(क) साँसनि ही …………….. तनुता करि।

Answer:

प्रसंग– प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक ‘अंतरा’ (भाग-1) में संकलित ‘हँसी की चोट’ शीर्षक कविता से ली गई है जिसे महाकवि देव ने रचा है। इस सवैये में कृष्ण गोपी से मुँह फेर लेते हैं। गोपियों की दशा को वर्णित किया गया है।

व्याख्या– कृष्ण के चले जाने पर गोपी कहती है कि जब से कान्हा ने मुँह फेरा है, तब से मेरी साँसों से वायु चली गई है अर्थात् साँस तो चल रही है किंतु उसमें जान नहीं है। उसके आँसू थम नहीं रहे हैं। उसके शरीर का सारा पानी सूख रहा है। अपने सारे गुण अर्थात् शक्ति को साथ लिए हुए तेज भी चला गया। कमजोरी के कारण मात्र कंकाल रह गया है। देव कहते हैं कि गोपी केवल कृष्ण से मिलने की आस में जीवित है। उस आशा के पास ही आकाश पानी शून्य भर रहा है, अतः वही मेरे जीने का सहारा है। गोपी कहती हैं कान्हा ने मेरी हँसी का भी हरण कर लिया है, मैं हँसना भूल गई हूँ। मैं उसे ढूँढती फिर रही हूँ, जिसने मेरे हृदय को हर लिया है।

विशेष– 

अनुप्रास अलंकार का प्रयोग है। 

हरि जू हरि में यमक अलंकार है।

(ख) झहरि ……………. गगन में।

Answer:

प्रसंग– पूर्ववत्। यह ‘सपना’ शीर्षक से रचित है। इसमें गोपी के एक स्वप्न का वर्णन है। वह दोबारा वियोग-स्थिति में पहुँच जाती है।

व्याख्या– गोपी कहती है कि मैंने सपने में देखा कि झर-झर की आवाज़ के साथ हल्की-हल्की बूँदै पड़ रही हैं। आकाश में गड़गड़ाहट करते हुए बादल छाए हुए हैं। उसी समय कृष्ण आकर कहते हैं कि चलो झूला झूलते हैं। मैं आनंद में मग्न होकर बहुत खुश हो रही थी। मैं उठना ही चाहती थी कि अभागी नींद खुल गई। मेरा भाग्य ही खराब था कि मेरी नींद ही खुल गई और मैं कृष्ण के साहचर्य का आनंद न उठा सकी। आँखें खुली तो देखा, न बादल थे और न ही कृष्ण थे। कृष्ण से मिलन का वह आनंद अब विरह की वेदना के रूप में बदल चुका था।

विशेष– 

‘झहरि-झहरि’ और ‘घहरि- घहरि’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है। 

दृश्य बिंब की आकर्षक रचना।

(ग) साहिब अंध ………….. बाच्यो।

Answer:

प्रसंग– पूर्ववत्! यह ‘दरबार’ शीर्षक से लिया गया है। इसके रचयिता रीतिकालीन कवि देव हैं। इसमें तत्कालीन समाज और दरबारी वातावरण के भोग-विलास में डूबकर लोग क्षीण हो चुके हैं।

व्याख्या– कवि कहता है कि वर्तमान समाज में राजा अंधे हो चुके हैं, दरबारी गूंगे हैं तथा राजसभा बहरी बन चुकी है। वे लोग सुंदर रंग-रूप पर सब कुछ लुटा रहे हैं। राजा अपने फर्ज और जिम्मेवारियों को अनदेखा कर रहे हैं । दरबारी चुप हैं। आम जनता की आवाज दब रही है। राजा और दरबारी अपना कर्त्तव्य भुलाकर रूप सौंदर्य में खो रहे हैं। वे लोग सारे पतित कार्य कर रहे हैं। 

विशेष–

‘मुसाहिब मूक’ आदि में अनुप्रास अलंकार। 

प्रतीक योजना सराहनीय है।

9. देव के अलंकार प्रयोग और भाषा प्रयोग के कुछ उदाहरण पठित पदों से लिखिए।

Answer:

देव की रचनाओं में अलंकारों का सुंदर प्रयोग मिलता है। दरबारी वैभव-विलास के अलंकरण का प्रभाव उनकी कविताओं पर भी पड़ा है। उनके काव्य में अनुप्रास और यमक के प्रति प्रबल आकर्षण है। उन्होंने अनुप्रास का प्रयोग करके तो सुंदर ध्वनि चित्र खींचे हैं।

उदाहरणार्थ– अनुप्रास अलंकार – ‘साँसनि ही सौ समीर, ‘अरू आँसुन, ‘तन की तनुता, हरै हँसि हेरि हियो, झहरि-झहरि झीनी’, ‘घहरि-घहरि घटा घेरी’, ‘उदयोई उठि’, ‘निगोड़ी नींद’ ‘जानि वा जगन’ ‘मुसाहिब मूक’ ‘रंग- रीझ’ ‘रूचि-राच्यो’, ‘निबरे नट’, ‘विसि नाच्यो’ आदि । यमक अलंकार – ‘हरि जू हरि’ ।

पुनरूक्ति प्रकाश अलंकार ‘झहरि-झहरि’ घहरि-घहरि’। प्रतीप एवं असंगति – उठि गई सो निगोड़ी नींद’।

भाषा की दृष्टि से देव ने साहित्यिक ब्रज भाषा का प्रयोग किया है। ध्वन्यात्मकता एवं आलंकारिकता उत्पन्न करने के लिए शब्दों को तोड़ा मरोड़ा भी है। लेकिन रीतिकालीन परंपरा का अनुसरण करते हुए मुक्तक शैली का प्रयोग किया है।

उदाहरणार्थ– “जा दिन तै मुख फेरि हरै हँसि, हेरि हियो जु लियो हरि जू हरि।” 

“चाहत उठयोई उठि गई सो निगोड़ी नींद।”

“साहिब अंध, मुसाहिब मूक”।

योग्यता-विस्तार 

1. ‘दरबार’ सवैये को भारतेंदु हरिश्चंद्र के नाटक ‘अंधेर नगरी’ के समकक्ष रखकर विवेचना कीजिए। 

Answer:

दरबार सवैये और भारतेंदु हरिश्चंद्र के नाटक ‘अंधेर नगरी’ के बीच में विवेचना करते समय हम देख सकते हैं कि दोनों काव्यरचनाओं में समाजिक और राजनीतिक परिपेक्ष्य बदलता है।

दरबार सवैये एक काव्य है जो तत्कालीन भारतीय समाज के दरबार के विचारों, भोगविलास के अद्भुत दृश्यों, और राजा की आदिकालीन जीवनशैली का वर्णन करता है। इसमें दिखाया जाता है कि राजा और उनके दरबारी अपने स्वार्थ के लिए किसी भी मूल्य पर भोगविलास का आनंद लेते हैं, और समाज की समस्याओं को नजरअंदाज करते हैं।

विवेचना करते समय, हम यह देख सकते हैं कि भारतेंदु हरिश्चंद्र के नाटक ‘अंधेर नगरी’ में भी समाज की समस्याओं का विवेचन किया गया है, लेकिन यहाँ पर समस्याओं के निरूपक स्वरूप को बताया गया है। नाटक में समाज की अंधकार, निर्विवादता, और दुर्भिक्ष की स्थिति को दर्शाया गया है, और यह भी दिखाया जाता है कि राजा और उनके परिवार के सदस्यों ने समस्याओं के समाधान की बजाय अपने स्वार्थ की पर्याप्त सफलता पाने के लिए विवादों को बढ़ा दिया है।

इस तरीके से, ‘दरबार’ सवैये और ‘अंधेर नगरी’ नाटक दोनों ही काव्यरचनाओं में समाज के अदृश्य समस्याओं और उनके समाधान के प्रति विचार करते हैं, लेकिन उनका दृष्टिकोण और संदेश विभिन्न हैं। ‘दरबार’ सवैये में भोगविलास की प्रशंसा होती है, जबकि ‘अंधेर नगरी’ में समस्याओं का सामाजिक और नैतिक परिपेक्ष्य किया जाता है।

2. देव के समान भाषा प्रयोग करने वाले किसी अन्य कवि की रचनाओं का संकलन कीजिए।

Answer:

देव के समान भाषा प्रयोग करने वाले कवि की रचनाओं का संकलन करते समय, हम अनुयायी कवि की विशेषता को महत्वपूर्ण देख सकते हैं। इसके बावजूद, कुछ भाषा के आदिकवि को देव के समान भाषा प्रयोग का परिचय किया जा सकता है। इन्हीं में से कुछ कवियों की रचनाएँ हैं :-

1. सूरदास: सूरदास, एक प्रमुख भक्ति काव्यकार, अपनी रचनाओं में भाषा के सुन्दर और सार्थक प्रयोग के लिए प्रसिद्ध हैं। उनके दोहे और पद हिन्दी साहित्य के महत्वपूर्ण हिस्से में शामिल हैं।

2. तुलसीदास: तुलसीदास ने ‘रामचरितमानस’ जैसी महाकाव्य कविता लिखी, जिसमें सुंदर संस्कृत और अवधी का मिश्रण होता है। उनके काव्य में सुंदर और प्रभावशाली भाषा प्रयोग का उदाहरण मिलता है।

3. कबीरदास: कबीरदास भी अपनी दोहों और भजनों के माध्यम से सांस्कृतिक और सामाजिक संदेश देने का प्रयास किया और उनकी भाषा प्रयोग महत्वपूर्ण है।

4. मीराबाई: मीराबाई के पद और भजन भक्ति और प्रेम के विषय में हैं, और उनकी भाषा में गहरी भावनाओं का सुंदर अभिव्यक्ति होती है।

इन कवियों की रचनाओं में उन्होंने अद्वितीय भाषा प्रयोग का प्रदर्शन किया और अपनी भावनाओं और विचारों को सुंदर ढंग से व्यक्त किया। इनके काव्य का संकलन करने से हम देव के समान भाषा प्रयोग करने वाले अन्य कवियों की महत्वपूर्ण रचनाओं का अध्ययन कर सकते हैं।

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